प्रिय साथी,
यह पोस्ट खास तौर से उन साथियों के लिए लिखी जा रही है जो समाज विज्ञानों को जन-सापेक्ष बनाने के व्यापक सरोकार से जुड़े रहें हैं. समाज विज्ञान जन-सापेक्ष बनें इसके लिए यह देखना जरूरी है कि विभिन्न भारतीय भाषायों में समाज विज्ञानों की उपस्थिति कैसी है. आपने अक्सर इन सवालों पर सोचा होगा कि भारतीय भाषायों में समाज विज्ञानों के विकास में चुनौतियाँ और संभावनाएं क्या हैं. हम इन्ही सवालों पर आपसी विचारों और अनुभवों कि साझेदारी से शुरुआत करना चाहते हैं.
पारंपरिक रूप से भारतीय भाषायों में समाज विज्ञानों के विकास के सवाल को अनुवाद के दायरे में देखा जाता रहा है. अनुवाद आज भी एक जरूरी और प्रासंगिक उपाय है. लेकिन, समाज विज्ञानों में अनुवाद के आज तक के अनुभवों से सीखने की जरूरत भी है. इसके अलावा इस सवाल को भी जांचने की जरूरत है की यह अनुवाद दृष्टी किस सीमा तक "ज्ञान की राजनीति" से प्रभावित रही है. क्यों न पुराने अनुभवों और प्रचलित विमर्श से सीखते हुए ज्ञान-निर्माण में अनुवाद की भूमिका को नए सिरे से तलाशने की कोशिश की जाये.
इस लिहाज से भारतीय भाषायों में समाज विज्ञानों के विकास के सवालों को ज्ञान-मीमांसा और शिक्षाशास्त्र की बहसों की रोशनी में देखने की जरूरत है. हम देख सकतें हैं कि भारत जैसे नव-शिक्षित होते देश की उच्च शिक्षा में पहली पीढी के पढाकुयों का आना कई दशकों तक चलते रहना है. यह नवागत पीढी भारतीय भाषायों में सोचने-जीने वाली पीढी होगी. इन पीढियों का अनुभव संसार जिस समाज विज्ञान की मांग करेगा वह न केवल भारतीय भाषायों में होगा बल्कि शिक्षाशास्त्र और ज्ञान की बनावट के हिसाब से कुछ फरक किस्म का होगा. बाजार का तर्क कहता है की मांग होने पर उत्पादन स्वयं होने लगता है, लेकिन यह तर्क उत्पादन की गुणवत्ता के बारे में आश्वस्त नहीं करता. यानी, जरूरत विचार-मंथन और पूर्व-तैयारी की है. उम्मीद है कि हम लोग इन चुनौतियों के समाधान खोजने में मददगार बनेंगे.
इन सवालों को सामने रख हम लोग दिल्ली विश्वविद्यालय (उत्तर परिसर) के राजनीति विज्ञान विभाग में 21-08-2009 (दिन शुक्रवार) को शाम ४ :०० बजे शुरूआती चर्चा के लिए मिल रहे हैं. आप जरूर आइयेगा. आपसे अनुरोध है की इन सवालों के लिहाज से आप जिस भी हम-ख्याल साथी को बुलाना चाहें जरूर बुलाईयेगा या हमें उनका संपर्क सूत्र दीजियेगा.
पंकज पुष्कर
pankaj.pushkar@gmail.com
०९८६८९८४४४२
०११-२६०१५३४०
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
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1 टिप्पणी:
swagat hai.
Medha
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