तुलसीदास रचित रामचरितमानस की शुरुआत बहुत रोचक है तुलसीदास संस्कृतवादी ब्राहमणों का क्रोध शांत कराने के लिए उन्हें बार-बार नमस्कार करते हैं भक्त कवि 'खल वंदना' और निर्विघ्न आगे बढ़ने की मंगलकामना करता है तुलसीदास का अपराध इतना भर था कि उन्होंने रामकथा को देवभाषा के सिंहासन से उतर कर अवधि भाखा कि जमीन पर ला पटका था. भले ही कहानी वर्ण व्यवस्था कि समर्थक, नारी को आदर्श पढ़ाने वाली और आर्य श्रेष्ठता का मिथक रचने वाली ही क्यों न हो लेकिन उसे अपात्र और असंस्कृत जनता तक पहुँचाना अक्षम्य था. संस्कृत से अवधि जैसी बोलियों में आते ही राम, राम के भक्त और राम का शास्त्र सब कुछ थोड़ा बहुत जरुर बदल गया. उस समय के संस्कृतवादियों के क्रोध के कारणों को समझा जा सकता है.
यह किस्सा हमें समाज चिंतन और भाषाओं के सवाल पर सोचने की प्रेरणा देता है. समाज विज्ञानं का कोई भी छात्र समझ सकता है कि जब धर्म और समाज से किसी तरह के बदलाव कि मांग नहीं करने वाली तुलसीकृत रामकथा तक को जनभाषा मैं आने पर इतना विरोध सहना पड़ा तो समाज के शास्त्र पर कायम अंग्रेजी की इजारेदारी हटा लेने से क्या होगा. यक़ीनन समाज चिंतन पर चाय अंग्रेजी का प्रभामंडल धूमिल पड़ जाएगा. तमाम निति नियम, विधि विधान और बौद्धिक विमर्श अंग्रेजी में दैवीय और पावन लगता है लेकिन भाषाओं में आते ही ढोल की पोल खुल जाती है. ज्ञान के आधार पर बनी दीवारों में खिड़कियाँ खुलने लगाती हैं. धीरे-धीरे खिड़कियाँ दरवाजे और रास्ते में बदल जाते हैं और दीवार परदों में.
हालांकि भाषाओं में और खास तौर से हिन्दी में समाज विज्ञानं के मुद्दे पर मंथन होते ही बहुत सारे सवाल सतह पर आ जाते हैं. आख़िर हिन्दी में समाज विज्ञानं के मायने क्या हैं और हम किस हिन्दी की बात कर रहे हैं? हम हिन्दी को किस रूप में देखना चाहते हैं? राष्ट्रभाषा, राजभाषा या जनभाषा. याद रखें कि भारत में राजकाज की भाषा और कामकाज की भाषा हमेशा अलग रही है. शासक वर्ग के लिए जरुरी होता है की सत्ता को लोक से दूर रखा जाए. हिन्दी में समाज विज्ञानं की किसी नई पहल से पहले हमें स्वयम से पूछना होगा कि हमें हिन्दी कैसी चाहिए?
हमें यह भी साफ कराने कि जरूरत होगी कि हमें हिन्दी की साधना करनी है या हिन्दी की मदद से कुछ साधना है. इतिहास बताता है भाषाओं की अस्मितापरक राजनीति भी की जा सकती है. हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हर भाषा का अपना सामाजिक भूगोल होता है. हम एक भाषा संसार से संवाद करते हुए ही उस संसार कि उलझन और अंतर्विरोधों को समझ सकते हैं. हिन्दी की तमाम सह्भाषाओं में सोचने और जीने वाले समाजों में छुपे ज्ञान और कौशल को खोज सकते हैं.
हमारे सामने समाज विज्ञानों से जुड़े कुछ मान्यताएँ और तजुर्बे भी हैं. एक मान्यता रही है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पडता कि ज्ञान किस भाषा में विकसित हुआ है. कुछ अन्य लोगों का कहना है कि जब कोई ज्ञान-विज्ञानं किसी खास भाषा में विकसित होता है तो वह शुद्ध निरपेक्ष सत्य नहीं रह जता है वरन उस भाषा से जुड़ी राजनीति, आर्थिकी और संस्कृति ज्ञान-विज्ञानं को अपने रंगों में रंग देती है. इस प्रस्ताव को जांचने की जरुरत है कि अंग्रेजी में सोचा और लिखा गया समाज विज्ञानं किस सीमा तक अंग्रेजी भाषी जगत के अनुभवों से प्रभावित है और किस सीमा तक सार्वभौमिक सत्य है. इस दिशा में आगे बढ़ते हुए कोई इस निष्कर्ष पर भी पहुँच सकता है की समाज विज्ञानं में कुछ भी शुद्ध और सत्य नहीं होता. यानि अंग्रेजी में समाज विज्ञानं और हिन्दी में समाज विज्ञानं दो बिल्कुल अलग चीजें हैं. यह दूसरी तरह की अति है.
आजादी के बाद भारत में उच्च शिक्षा का काफी फैलाव हुआ. इसी के साथ समाज विज्ञानं पढने-पढाने के लिए किताबों का यूं कहें की पाठ्य-पुस्तकों का संसार बनना लाजिमी था. लेकिन पुस्तकों का हरा-भरा कंसर नहीं बाना वरन मुनाफाखोरी भर के लिए एक बाज़ार बना. बाज़ार भी ऐसा बना जिसमें गुणवत्ता की चीजों को ढूंढना और घटिया चीजों से बचना मुश्किल साबित हुआ. समाज विज्ञानं की किताबों को समाज के बारे में समझ साफ कराने और आलोचनात्मक चेतना जगाने का काम करना था. यह न हो सका. बहुत लोग कहते हैं की जिस जगह से शुरुआत हुई वह ही ग़लत थी. हर विज्ञानं को और खासतौर का समाज का विज्ञानं को स्थानीय हवा-पानी-मिटटी और उय क्षेत्र के इतिहास के अनुसार रूप-रंग की जरूरत होती है.
दरअसल समाज चिंतन की मुख्यधारा भी पंडित नेहरू के एक बड़े प्रोजेक्ट से अछूती नहीं रही. देश के पहले प्रधानमंत्री के आधुनिकता-बोध पर कैम्ब्रिज और मास्को का प्रभाव काफी गहरा था. 'सोशल इंजीनियरिंग' जैसे शब्द के प्रचलन में आने से बहुत पहले ही नेहरू इसे शुरू कर चुके थे. अपने समय के इस करिश्माई नेता का विश्वास था की यूरोप में हुए दो सौ वर्ष में कर सकता है. यह विश्वास नेकनीयती से तो भरा था लेकिन अपने समाज की बुनावट और खासियत की अनदेखी भी इसमें देश की 'अकुशल', 'अवैज्ञानिक' और 'पिछड़ी' जनता में 'वैज्ञानिक चेतना' भरने और 'प्रशिक्षित' कराने का दंभ भी था.
देशभर की लघु-परम्पराओं और सामाजिक सरंचानाओं में छुपे ज्ञान और कौशल की अवहेलना कर शुरुआती नेतृत्व ने औद्योगिक देशों में विकसित ज्ञान को सर-आँखों पर लिया. नेहरू ने गाँधी की दृष्टि को तो 'एक बूढ़े की सनक' कह कर खारिज किया ही, जेपी और लोहिया जैसे अपने शुरुआती समाजवादी मित्रों को भी पूरी तरह अनदेखा किया. परिणाम यह हुआ की देश के राजनीति अभ्यास में लोकतंत्र के ब्रितानी-अमरीकी तजुर्बे को मानक और आदर्श मानने की एक ग़लत शुरुआत हो गई. विकास का रास्ता बहुत करके वही अपनाया गया जो यूरोप में तय हो गया था. राजनीति की इस विवशता को राजनीति के शास्त्र ने अपनी सीमा बना लिया. इस प्रकार आजादी के बाद से ही जो समाज विज्ञानं भारत भर में पसरा वह भारत जैसे समाजों का अपना विज्ञानं था, कहना मुश्किल है. असल में यह एक ऐसा समाज विज्ञानं था जो बहरी तौर से तो अंग्रेज़ी में था ही, अंदरूनी तौर से भी था. समाज विज्ञानं और खासकर राजनीति के जो पाठ्यक्रम और किताबें प्रचलन में हैं उन पर बहुत गहरा असर ब्रितानी-अमरीकी दबदबे का है. यूरोपीय समाज में विज्ञानं की बुनियाद पश्चिमी समाज और राजनीति के सैकड़ों बरसों के अनुभव पर पड़ी. भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों के बुद्धिजीवी वर्ग ने भी अपना समाज विज्ञानं पाश्चात्य जगत के लिए अनुभवों पर ही खड़ा किया. अपने समाज का राजनीतिक तंत्र बनाने के लिए वैचारिक स्वतंत्रता और रचनात्मकता की जरूरत होती है. अपने समाज के सापेक्ष समाज की भाषा मे चिंतन और एक दिशा मे मददगार हो सकती थी लेकिन उपनिवेशवाद के इस मोर्चे पर लड़ने से पहले ही आत्म-समर्पण कर दिया गया.
पश्चिमी शैक्षिक जगत से समाज विज्ञानों को जस का तस् उठा लेना तात्कालिक रूप से सुविधाजनक माना गया लेकिन इसके कुछ दूरगामी नुकसान हुए. अपने समाज को सामने रख उसका शास्त्र विकसित करना चुनौती भरा काम था. वर्ण व्यवस्था की गोद में पली आधुनिक जड़ता और काहिली ने इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया. नकलची पीढियों को पैदा करने का आसान लेकिन आत्मघाती रास्ता चुन लिया गया. इस पूरे समर्पण के बदले हमें स्वयं को पश्चिम की नज़रों से देखने वाला एक चश्मा मिला. समर्पण कराने में नाक इस कदर घिस गई थी कि यह चश्मा भी ठीक से टिक न सका. इस चश्मे को लगातार दोनों हाथों का पकडे रहने कि जरूरत आ पड़ी.
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भाषाओं में समाज विज्ञानं
- पंकज पुष्कर
तुलसीदास रचित रामचरितमानस की शुरुआत बहुत रोचक है तुलसीदास संस्कृतवादी ब्राहमणों का क्रोध शांत कराने के लिए उन्हें बार-बार नमस्कार करते हैं भक्त कवि 'खल वंदना' और निर्विघ्न आगे बढ़ने की मंगलकामना करता है तुलसीदास का अपराध इतना भर था कि उन्होंने रामकथा को देवभाषा के सिंहासन से उतर कर अवधि भाखा कि जमीन पर ला पटका था. भले ही कहानी वर्ण व्यवस्था कि समर्थक, नारी को आदर्श पढ़ाने वाली और आर्य श्रेष्ठता का मिथक रचने वाली ही क्यों न हो लेकिन उसे अपात्र और असंस्कृत जनता तक पहुँचाना अक्षम्य था. संस्कृत से अवधि जैसी बोलियों में आते ही राम, राम के भक्त और राम का शास्त्र सब कुछ थोड़ा बहुत जरुर बदल गया. उस समय के संस्कृतवादियों के क्रोध के कारणों को समझा जा सकता है.
यह किस्सा हमें समाज चिंतन और भाषाओं के सवाल पर सोचने की प्रेरणा देता है. समाज विज्ञानं का कोई भी छात्र समझ सकता है कि जब धर्म और समाज से किसी तरह के बदलाव कि मांग नहीं करने वाली तुलसीकृत रामकथा तक को जनभाषा मैं आने पर इतना विरोध सहना पड़ा तो समाज के शास्त्र पर कायम अंग्रेजी की इजारेदारी हटा लेने से क्या होगा. यक़ीनन समाज चिंतन पर चाय अंग्रेजी का प्रभामंडल धूमिल पड़ जाएगा. तमाम निति नियम, विधि विधान और बौद्धिक विमर्श अंग्रेजी में दैवीय और पावन लगता है लेकिन भाषाओं में आते ही ढोल की पोल खुल जाती है. ज्ञान के आधार पर बनी दीवारों में खिड़कियाँ खुलने लगाती हैं. धीरे-धीरे खिड़कियाँ दरवाजे और रास्ते में बदल जाते हैं और दीवार परदों में.
हालांकि भाषाओं में और खास तौर से हिन्दी में समाज विज्ञानं के मुद्दे पर मंथन होते ही बहुत सारे सवाल सतह पर आ जाते हैं. आख़िर हिन्दी में समाज विज्ञानं के मायने क्या हैं और हम किस हिन्दी की बात कर रहे हैं? हम हिन्दी को किस रूप में देखना चाहते हैं? राष्ट्रभाषा, राजभाषा या जनभाषा. याद रखें कि भारत में राजकाज की भाषा और कामकाज की भाषा हमेशा अलग रही है. शासक वर्ग के लिए जरुरी होता है की सत्ता को लोक से दूर रखा जाए. हिन्दी में समाज विज्ञानं की किसी नई पहल से पहले हमें स्वयम से पूछना होगा कि हमें हिन्दी कैसी चाहिए?
हमें यह भी साफ कराने कि जरूरत होगी कि हमें हिन्दी की साधना करनी है या हिन्दी की मदद से कुछ साधना है. इतिहास बताता है भाषाओं की अस्मितापरक राजनीति भी की जा सकती है. हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हर भाषा का अपना सामाजिक भूगोल होता है. हम एक भाषा संसार से संवाद करते हुए ही उस संसार कि उलझन और अंतर्विरोधों को समझ सकते हैं. हिन्दी की तमाम सह्भाषाओं में सोचने और जीने वाले समाजों में छुपे ज्ञान और कौशल को खोज सकते हैं.
हमारे सामने समाज विज्ञानों से जुड़े कुछ मान्यताएँ और तजुर्बे भी हैं. एक मान्यता रही है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पडता कि ज्ञान किस भाषा में विकसित हुआ है. कुछ अन्य लोगों का कहना है कि जब कोई ज्ञान-विज्ञानं किसी खास भाषा में विकसित होता है तो वह शुद्ध निरपेक्ष सत्य नहीं रह जता है वरन उस भाषा से जुड़ी राजनीति, आर्थिकी और संस्कृति ज्ञान-विज्ञानं को अपने रंगों में रंग देती है. इस प्रस्ताव को जांचने की जरुरत है कि अंग्रेजी में सोचा और लिखा गया समाज विज्ञानं किस सीमा तक अंग्रेजी भाषी जगत के अनुभवों से प्रभावित है और किस सीमा तक सार्वभौमिक सत्य है. इस दिशा में आगे बढ़ते हुए कोई इस निष्कर्ष पर भी पहुँच सकता है की समाज विज्ञानं में कुछ भी शुद्ध और सत्य नहीं होता. यानि अंग्रेजी में समाज विज्ञानं और हिन्दी में समाज विज्ञानं दो बिल्कुल अलग चीजें हैं. यह दूसरी तरह की अति है.
आजादी के बाद भारत में उच्च शिक्षा का काफी फैलाव हुआ. इसी के साथ समाज विज्ञानं पढने-पढाने के लिए किताबों का यूं कहें की पाठ्य-पुस्तकों का संसार बनना लाजिमी था. लेकिन पुस्तकों का हरा-भरा कंसर नहीं बाना वरन मुनाफाखोरी भर के लिए एक बाज़ार बना. बाज़ार भी ऐसा बना जिसमें गुणवत्ता की चीजों को ढूंढना और घटिया चीजों से बचना मुश्किल साबित हुआ. समाज विज्ञानं की किताबों को समाज के बारे में समझ साफ कराने और आलोचनात्मक चेतना जगाने का काम करना था. यह न हो सका. बहुत लोग कहते हैं की जिस जगह से शुरुआत हुई वह ही ग़लत थी. हर विज्ञानं को और खासतौर का समाज का विज्ञानं को स्थानीय हवा-पानी-मिटटी और उय क्षेत्र के इतिहास के अनुसार रूप-रंग की जरूरत होती है.
दरअसल समाज चिंतन की मुख्यधारा भी पंडित नेहरू के एक बड़े प्रोजेक्ट से अछूती नहीं रही. देश के पहले प्रधानमंत्री के आधुनिकता-बोध पर कैम्ब्रिज और मास्को का प्रभाव काफी गहरा था. 'सोशल इंजीनियरिंग' जैसे शब्द के प्रचलन में आने से बहुत पहले ही नेहरू इसे शुरू कर चुके थे. अपने समय के इस करिश्माई नेता का विश्वास था की यूरोप में हुए दो सौ वर्ष में कर सकता है. यह विश्वास नेकनीयती से तो भरा था लेकिन अपने समाज की बुनावट और खासियत की अनदेखी भी इसमें देश की 'अकुशल', 'अवैज्ञानिक' और 'पिछड़ी' जनता में 'वैज्ञानिक चेतना' भरने और 'प्रशिक्षित' कराने का दंभ भी था.
देशभर की लघु-परम्पराओं और सामाजिक सरंचानाओं में छुपे ज्ञान और कौशल की अवहेलना कर शुरुआती नेतृत्व ने औद्योगिक देशों में विकसित ज्ञान को सर-आँखों पर लिया. नेहरू ने गाँधी की दृष्टि को तो 'एक बूढ़े की सनक' कह कर खारिज किया ही, जेपी और लोहिया जैसे अपने शुरुआती समाजवादी मित्रों को भी पूरी तरह अनदेखा किया. परिणाम यह हुआ की देश के राजनीति अभ्यास में लोकतंत्र के ब्रितानी-अमरीकी तजुर्बे को मानक और आदर्श मानने की एक ग़लत शुरुआत हो गई. विकास का रास्ता बहुत करके वही अपनाया गया जो यूरोप में तय हो गया था. राजनीति की इस विवशता को राजनीति के शास्त्र ने अपनी सीमा बना लिया.
इस प्रकार आजादी के बाद से ही जो समाज विज्ञानं भारत भर में पसरा वह भारत जैसे समाजों का अपना विज्ञानं था, कहना मुश्किल है. असल में यह एक ऐसा समाज विज्ञानं था जो बहरी तौर से तो अंग्रेज़ी में था ही, अंदरूनी तौर से भी था. समाज विज्ञानं और खासकर राजनीति के जो पाठ्यक्रम और किताबें प्रचलन में हैं उन पर बहुत गहरा असर ब्रितानी-अमरीकी दबदबे का है. यूरोपीय समाज में विज्ञानं की बुनियाद पश्चिमी समाज और राजनीति के सैकड़ों बरसों के अनुभव पर पड़ी. भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों के बुद्धिजीवी वर्ग ने भी अपना समाज विज्ञानं पाश्चात्य जगत के लिए अनुभवों पर ही खड़ा किया. अपने समाज का राजनीतिक तंत्र बनाने के लिए वैचारिक स्वतंत्रता और रचनात्मकता की जरूरत होती है. अपने समाज के सापेक्ष समाज की भाषा मे चिंतन और एक दिशा मे मददगार हो सकती थी लेकिन उपनिवेशवाद के इस मोर्चे पर लड़ने से पहले ही आत्म-समर्पण कर दिया गया.
पश्चिमी शैक्षिक जगत से समाज विज्ञानों को जस का तस् उठा लेना तात्कालिक रूप से सुविधाजनक माना गया लेकिन इसके कुछ दूरगामी नुकसान हुए. अपने समाज को सामने रख उसका शास्त्र विकसित करना चुनौती भरा काम था. वर्ण व्यवस्था की गोद में पली आधुनिक जड़ता और काहिली ने इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया. नकलची पीढियों को पैदा करने का आसान लेकिन आत्मघाती रास्ता चुन लिया गया. इस पूरे समर्पण के बदले हमें स्वयं को पश्चिम की नज़रों से देखने वाला एक चश्मा मिला. समर्पण कराने में नाक इस कदर घिस गई थी कि यह चश्मा भी ठीक से टिक न सका. इस चश्मे को लगातार दोनों हाथों का पकडे रहने कि जरूरत आ पड़ी.
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